प्रबंध की प्रकृति एवं महत्त्व ( Nature and Importance of Management )
प्रबंध की प्रकृति एवं महत्त्व
( Nature and Importance of Management )
प्रबंध ( Management ) का अर्थ - संकुचित अर्थ में ," प्रबंध का अर्थ दूसरे व्यक्तियों से कार्य कराने की कला है। " परंतु विस्तृत अर्थ में ," प्रबंध का अर्थ अन्य व्यक्तियों द्वारा तथा उनके साथ मिलकर कार्य करने व कराने की कला है। "
अच्छे प्रबंध के उदाहरण है - विप्रो, एच. सी. एल., पेप्सी, कोक और रिलायंस आदि।
सरल शब्दों में , " प्रबंध से अभिप्राय उस प्रक्रिया से है जिसमें लोग समूह में कार्य करते हुए निर्धारित लक्ष्यों को कुशलता से प्राप्त करते है। "
प्रबंध की परिभाषा ( Definition of Management ) -
हेनरी फेयोल के अनुसार ," प्रबंध से आशय पूर्वानुमान लगाना एवं योजना बनाना, संगठन करना, आदेश देना, समन्वय करना तथा नियंत्रण करना है। "
प्रभावपूर्णता एवं कुशलता का अर्थ -
प्रभावपूर्णता - प्रभावपूर्णता से अभिप्राय काम को समय पर पूरा करने से है चाहे लागत कितनी ही क्यों न आए।
कुशलता - कुशलता से अभिप्राय काम को न्यूनतम लागत पर पूरा करने से है।
प्रभावपूर्णता और कुशलता दोनों समान रूप से आवश्यक हैं। प्रभावपूर्णता और कुशलता मिलकर एक संगठन को समृद्धि और लाभ के उच्चतम शिखर तक ले जाते हैं वहीं दूसरी तरफ, इन दोनों की अनुपस्थिति संगठन की विफलता का कारण बनती हैं।
प्रबंध की विशेषताएं - प्रबंध एक ऐसी कला है जिसके तहत ऐसे वातावरण का निर्माण किया जाता है जिसमें व्यक्ति अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर सके और संगठन के उद्देश्यों की प्राप्ति में अपना सहयोग प्रदान कर सकें।
प्रबंध की विशेषताएं निम्नलिखित है -
i. उद्देशपूर्ण प्रक्रिया - प्रबंध एक लक्ष्य प्रधान प्रक्रिया है जो अनेक व्यक्तिगत प्रयासों को संयोजित कर संगठनात्मक उद्देशों को प्राप्त करने में सहायता प्रदान करती हैं।
ii. सर्वव्यापी - प्रबंध सर्वव्यापी है जो सभी प्रकार के संगठनों जैसे सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक आदि के लिए आवश्यक हैं। हालांकि उनके कार्य करने का तरीका भिन्न हो सकता हैं।
iii. निरंतर चलने वाली प्रक्रिया - प्रबंध कोई ऐसी प्रक्रिया नहीं है जिसे हमेशा के लिए एक बार ही कर दिया जाए बल्कि या निरंतर चलने वाली प्रक्रिया हैं। प्रबंध के कार्य जैसे - नियोजन, संगठन, नियुक्तिकरण, निर्देशन और नियंत्रण की आवश्यकता लगातार होती हैं।
iv. सामूहिक प्रक्रिया - प्रबंध एक सामूहिक गतिविधि हैं। एक संगठन में अनेक व्यक्ति संगठनात्मक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए कार्य करते है। कोई भी प्रबंधकीय निर्णय अकेले में नहीं लिए जा सकते है। उदाहरण के लिए विपणन प्रबंधक, वित्तीय प्रबंधक से परामर्श करके ही साख सुविधा को बढ़ा सकता हैं।
v. गत्यात्मक कार्य - प्रबंध एक गत्यात्मक कार्य हैं जिसे परिवर्तित वातावरण के अनुरूप कार्य करना पड़ता हैं। उदाहरण के लिए MC Donalds ने भारतीय लोगों की पसंद के अनुसार अपनी सूची ( menu ) में कई बदलाव किए हैं।
vi. अमूर्त शक्ति - प्रबंध एक शक्ति है जिसे देखा नहीं जा सकता हैं केवल उसकी उपस्थिति को महसूस किया जा सकता है। जब एक संगठन में उद्देश्यों को योजनाओं के अनुरूप प्राप्त किया जा रहा हो तो कहा जायेगा कि यहाँ का प्रबंध अच्छा हैं।
vii. उत्पादन का एक घटक - प्रबंध उत्पादन का एक घटक है इसी के द्वारा उत्पादन के कार्य को सफल बनाया जाता है। प्रबंध सभी घटकों में समन्वय स्थापित कर संगठन के उद्देश्यों को प्राप्त करने में मदद करता हैं।
viii. सभी स्तरों पर आवश्यक - प्रबंध सभी स्तरों पर आवश्यक है चाहें व उच्चस्तरीय हो, मध्यस्तरीय हो या निम्नस्तरीय हो।
ix. कला और विज्ञान दोनों - प्रबंध कला और विज्ञान दोनों हैं। प्रबंध कला इसलिए है क्योंकि यह प्रबंधक के ज्ञान व कौशल के व्यावहारिक प्रयोग से संबंध रखता है। प्रबंध विज्ञान इसलिए है क्योंकि यह उचित रूप से जांचे गए सिद्धंतों पर आधारित होता हैं।
x. उभरता हुआ पेशा - प्रबंधक के लिए किसी विशिष्ट डिग्री या लाइसेंस का होना अनिवार्य नहीं है और न ही किसी आचार संहिता का पालन करना पड़ता हैं। अतः यह एक ५ पेशा नहीं है बल्कि यह उभरता हुआ पेशा है।
प्रबंध का महत्त्व - प्रबंध एक ऐसी कला है जिसके तहत ऐसे वातावरण का निर्माण किया जाता है जिसमें व्यक्ति अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर सके और संगठन के उद्देश्यों की प्राप्ति में अपना सहयोग प्रदान कर सकें।
प्रबंध के महत्त्व निम्नलिखित है -
i. सामूहिक लक्ष्यों को प्राप्त करने में सहायक - प्रबंध सामूहिक लक्ष्यों को प्राप्त करने में सहायक होता है क्योंकि प्रबंध का कार्य संगठन के कुल उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए व्यक्तिगत प्रयत्न को समान दिशा देना है।
ii. उत्पादन क्षमता में वृद्धि करना - प्रबंधक का लक्ष्य संगठन की क्रियाओं के श्रेष्ठ नियोजन, संगठन, निदेशन, नियुक्तिकरण एवं नियंत्रण के माध्यम से लागत को कम करना एवं उत्पादकता को बढ़ाना है।
iii. गतिशील संगठन का निर्माण करना - प्रत्येक संगठन का प्रबंध निरंतर बदल रहे पर्यावरण के अंतर्गत करना होता है। अतः प्रबंधक गतिशील संगठन का निर्माण करता हैं। प्रबंध द्वारा लोगों को इन परिवर्तनों को अपनाने में सहायता प्राप्त होती हैं जिससे कि संगठन अपनी प्रतियोगी श्रेष्ठता को बनाए रखने में सफल रहता है।
iv. व्यक्तिगत उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायक - प्रबंधक अपनी टीम को इस प्रकार से प्रोत्साहित करता है एवं उसका नेतृत्व करता है कि प्रत्येक सदस्य संगठन के कुल उद्देश्यों में योगदान देते हुए व्यक्तिगत उद्देश्यों को प्राप्त करते है।
v. समाज के विकास में सहायक - संगठन बहुउद्देश्यीय होता है जो इसके विभिन्न घटकों के उद्देश्यों को पूरा करता है। प्रबंध श्रेष्ठ गुणवत्ता वाली वस्तु एवं सेवाओं को उपलब्ध कराने, रोजगार के अवसरों को पैदा करने, लोगों के भले के लिए नयी तकनीकों को अपनाने, बुद्धि एवं विकास के रास्ते पर चलने में सहायक होता है जिसके कारण प्रबंध समाज के विकास में भी सहायक होता हैं।
प्रबन्ध की प्रकृति - प्रबन्ध विज्ञान है या कला अथवा पेशा। कुछ विद्वान प्रबन्ध को कला बताते है, क्योंकि यह प्रबन्धक ज्ञान एवं कौशल के व्यावहारिक प्रयोग से समबन्ध रखता है। जबकि कुछ विद्वान इसे विज्ञान मानते है क्योंकि यह उचित रूप से जांचे गये सिद्धान्तों पर आधारित होता है। कुछ इसे पेशा भी मानते है।
✓ प्रबन्ध एक कला के रूप में - कला की कुछ विशेषताएँ होती है जो की निम्नलिखित है:
i. सैद्धान्तिक ज्ञान - कला हमेशा सैद्धान्तिक ज्ञान पर आधारित होता है जिसके लिए क्रमबद्ध एवं संगठन अध्ययन सामग्री उपलब्ध होनी आवश्क है।
ii. वैयक्तिक प्रयोग - एक व्यक्ति दूसरे से भिन्न प्रकार से कार्य करता है, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति के कार्य करने की शैली भिन्न होती है।
iii. अभ्यास एवं सृजनशीलता - कला में विद्यमान सृजनशीलता तथा अभ्यास समाहित होता है। एक कलाकर की क्षमता इस बात पर निर्भर करती है कि उसने कितना अभ्यास किया है तथा वह कितना सृजनशील है।
प्रबन्ध के भी विभिन्न क्षेत्रों से संबंधित साहित्य उपलब्ध है। सभी प्रबन्धक अपने ज्ञान स्तर के आधार पर अलग अलग ढंग से व्यवसाय को चलाते है तथा हर प्रबन्धक अभ्यास, सृजनशीलता, नवीकरण के संयोग आदि के माध्यम से आगे बढ़ता है।
प्रबन्ध में कला की सभी विशेषताएँ समाहित होती है अतः इसे कला कहा जा सकता है।
✓ प्रबन्ध एक विज्ञान के रूप में - विज्ञान किसी विषय का क्रमबद्ध ज्ञान होता है जो सही निष्कर्ष वाले निश्चित सिद्धांतों पर आधारित होता है, जिसकी जाँच की जा सकती है। विज्ञान की निम्नलिखित विशेषताएँ होती है -
i. ज्ञान का क्रम क्रमबद्ध रूप - विज्ञान ज्ञान का क्रम क्रमबद्ध रूप हैं जो सिद्धांतों, अभ्यासों एवं प्रयोगों पर आधारित होता है।
ii. प्रयोग एवं अवलोकन पर आधारित सिद्धांत - वैज्ञानिक सिद्धांत कई वर्षों के शोध, परीक्षण, प्रयोग तथा अवलोकन के बाद प्राप्त होते हैं।
iii. सार्वभौमिक रूप से स्वीकृत सिद्धांत - ये सार्वभौमिक रूप से स्वीकृत सिद्धांत हैं जिन्हें कहीं भी तथा कभी भी सिद्ध किया जा सकता है।
मनुष्य की प्रकृति परिवर्तनशील है, इसलिए मानव तत्व के विद्यमान होने की वजह से प्रबन्ध विशुद्ध विज्ञान न होकर सामाजिक विज्ञान है।
✓ पेशे के रूप प्रबन्ध - पेशा वह जीविक का साधन है जो विशिष्ट ज्ञान और प्रशिक्षण द्वारा समाज के विभिन्न वर्गों की सेवा करते है। जिसमे प्रवेश प्रतिबन्धित होता है।
इसकी मुख्य विशेषताएँ इस प्रकार है -
i. ज्ञान का सुभाषित निकाय - सभी पेशे परिभाषित ज्ञान के समूह पर आधारित होते हैं जिसे शिक्षा से अर्जित किया जाता है।
ii. प्रतिबन्धित प्रवेश - प्रत्येक पेशे में परीक्षा अथवा शैक्षणिक योग्यता के आधार पर प्रवेश होता है।
iii. सेवा उद्देश्य - प्रत्येक पेशे का मुख्य उद्देश्य अपने ग्राहकों की सेवा करना होता है।
iv. नैतिक आचार संहिता - सभी पेशे किसी न किसी पेशेवर संघ से जुड़े होते है जो इनमे प्रवेश का नियमन करते हैं।
प्रबन्धक के लिए किसी विशिष्ट डिग्री या लाइसेंस का होना अनिवार्य नहीं है और न ही किसी आचार संहिता का पालन
करना पड़ता हैं।
प्रबंध पेशे की सभी विशेषताओं को संतुष्ट नहीं करता हैं, अतः प्रबंध को एक पूर्ण पेशा नहीं कहा जा सकता हैं अपितु उभरता हुआ पेशा कहा जा सकता हैं।
✓ अतः प्रबंध कला हैं, विज्ञान हैं और उभरता हुआ पेशा हैं।
प्रबंध के उद्देश्य - प्रबंध एक ऐसी कला है जिसके तहत ऐसे वातावरण का निर्माण किया जाता है जिसमें व्यक्ति अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर सके और संगठन के उद्देश्यों की प्राप्ति में अपना सहयोग प्रदान कर सकें।
प्रबंध के उद्देश्य निम्नलिखित है -
i. संगठनात्मक उद्देश्य - इसका अभिप्राय संगठन में उपलब्ध मानवीय व भौतिक संसाधनों का उपयोग सभी हितार्थियों के हित में करने से हैं।
(a). जीवित रहना - प्रबंध द्वारा विभिन्न व्यावसायिक क्रियाओं से संबंधित सही निर्णय लेकर यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि व्यवसाय लंबे समय तक जीवित रहे।
(b). लाभ - लाभ अर्जित करना ताकि लागतों एवं जोखिमों को सहन किया जा सके।
(c). विकास - विकास करना ताकि भविष्य में संगठन और अच्छे प्रकार से कार्य कर सके। विकास को ' बिक्री, कर्मचारियों की संख्या, पूंजी विनियोग एवं उत्पादों की संख्या ' से मापा जा सकता हैं।
ii. सामाजिक उद्देश्य - इसका अभिप्राय प्रबंधकीय क्रियाओं के दौरान सामाजिक हित का ध्यान रखने से हैं। उदाहरण के लिए -
(a). उचित कीमत पर गुणवतापूर्ण वस्तुओं की आपूर्ति करना।
(b). करों का ईमानदारी से भुगतान करना।
(c). उत्पादन के लिए पर्यावरण मित्र विधियों को अपनाना।
(d). समुदाय को वित्तीय सहायता प्रदान करना।
(e). समाज के कमजोर वर्ग को रोज़गार के अवसर प्रदान करना।
iii. वैयक्तिक उद्देश्य - ये उद्देश्य संगठन के कर्मचारियों से संबंधित होते है। प्रबंध को कर्मचारियों की भिन्न भिन्न आवश्यकता को पूर्ण करना पड़ता है। उदाहरण के लिए
(a). कर्मचारियों को उचित वेतन देना।
(b). कर्मचारियों की सामाजिक आवश्यकता को पूरा करना।
(c). व्यक्तिगत वृद्धि एवं विकास संबंधी आवश्यकताएं।
" प्रबंध को वैयक्तिक एवं संगठनात्मक उद्देश्यों में समन्वय रखना चाहिए। "
हम यहीं आशा करते है आपको ये ब्लॉग पसंद आया होगा। अगर आपको ये ब्लॉग पसंद आया है तो प्लीज कॉमेंट और शेयर करना ना भूलें।
Thank you for reading this article ☺️☺️
Comments
Post a Comment