एकाकी व्यवसाय (Sole Trade)
एकाकी व्यवसाय
(Sole Trade)
आज हम व्यावसायिक संगठन के पहले स्वरूप एकाकी व्यवसाय के बारे में जानेगे आख़िरकार एकाकी व्यवसाय क्या है ? एकाकी व्यवसाय का क्या अर्थ होता है ? एकाकी व्यवसाय की परिभाषाएं बताएंगे और एकाकी व्यवसाय की विशेषताएं क्या क्या है ? आदि तो चालिए हम इस ब्लॉग के माध्यम से समझते हैं…
एकाकी व्यवसाय क्या है ?
व्यावसायिक संगठन का सबसे प्राचीनतम तथा प्रारम्भिक स्वरूप एकाकी व्यवसाय है। एकाकी व्यवसाय का इतिहास उतना ही प्राचीन है जितना मानव का परिवार बनाकर रहना। डॉ. स्प्रीगल के शब्दों में, "प्राचीन पारिवारिक समूह जिसमें परिवार का मुखिया (पिता) प्रायः स्वामी की भाँति कार्य करता था, लगभग आधुनिक एकाकी स्वामित्व की भाँति थे।"
एकाकी व्यवसाय का अर्थ (Meaning of Sole Trade)
'एकाकी व्यवसाय' व्यावसायिक संगठन का वह स्वरूप है जिसको एक व्यक्ति स्थापित करता है वही व्यक्ति इसका स्वामी होता है। व्यवसाय का सम्पूर्ण उत्तरदायित्व इस एक व्यक्ति के कन्धों पर होता है। वही व्यक्ति आवश्यक पूंजी की व्यवस्था करता है, संचालन करता है लाभ तथा हानि का स्वयं ही अधिकारी होता है। एकाकी व्यापार के स्वामी को एकाकी व्यापारी, व्यक्तिगत साहसी, व्यक्तिगत व्यवस्थापक एकल स्वामी इत्यादि विभिन्न नामों से पुकारा जाता है।
एकाकी व्यवसाय की परिभाषाएँ (Definitions of Sole Trade) विभिन्न विद्वानों द्वारा प्रतिपादित एकाकी व्यवसाय की परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं -
हैने के अनुसार, "व्यक्तिगत साहसी व्यापारिक संगठन का वह स्वरूप है जिसका अध्यक्ष केवल एक ही व्यक्ति होता है, जिस पर सारा उत्तरदायित्व होता है, जो व्यापार का संचालन करता है और जो अकेला ही व्यापार की असफलता का जोखिम भी उठाता है।"
एस० आर० डावर के अनुसार, "एकल व्यवसायी वह व्यक्ति है जो अपना स्वयं का व्यापार चलाता है अर्थात् बिना किसी अन्य व्यक्ति की साझेदारी के। वह अपनी स्वयं की पूंजी लगाता है तथा स्वयं अपना ही श्रम प्रयुक्त करता है। वह दूसरों की सहायता भी ले सकता है किन्तु उनको पारिश्रमिक के रूप में वेतन देता है।"
चार्ल्स के अनुसार, "व्यक्तिगत स्वामित्व व्यापार के उस उपक्रम को कहते हैं जिसमें एक व्यक्ति ही स्वामी होता है तथा वही सामान्यतः उसका प्रबन्धक एवं मूलाधार होता है। यही व्यक्ति व्यवसाय के कार्य संचालन एवं लाभ-हानि का पूर्ण उत्तरदायी होता है।"
विलियम आर. वैसेट के अनुसार," एकाकी व्यवसाय विश्व में सर्वश्रेष्ठ है यदि वह व्यक्ति इतना बड़ा हो कि वह व्यापार सम्बन्धी हर वस्तु का नियन्त्रण कर सके।"
निष्कर्ष - उपर्युक्त परिभाषाओं से यह स्पष्ट होता है कि एकाकी व्यवसाय का स्वामी केवल एक ही व्यक्ति होता है। व्यापार संचालन का समस्त उत्तरदायित्व व्यवसाय के स्वामी पर होता है। यदि व्यापार में लाभ होता है तो वही समस्त लाभ का अधिकारी रहेगा इसके विपरीत यदि हानि होती है तो वही समस्त हानि को सहता है। अकेला स्वामी और साहसी होने के अतिरिक्त वह व्यवसाय का संगठनकर्ता तथा प्रबन्धक भी होता है।
एकाकी व्यापार का यह आशय है कि व्यवसाय का समस्त कार्य व्यापार का स्वामी स्वयं ही करे। आवश्यकता तथा सुविधानुसार वह अपनी सहायता के लिए आवश्यक कर्मचारियों को नियुक्त कर सकता है। ये कर्मचारी व्यवसाय के वेतनभोगी कर्मचारी होंगे और व्यापार संचालन में स्वामी की सहायतार्थ उसकी आज्ञानुसार कार्य करेंगे।
एकल व्यापारी अपने चातुर्य तथा परिश्रम एवं व्यावसायिक सम्बन्ध एवं कीर्ति, विचारशक्ति, साहर सच्चाई, योग्यता, शिक्षा एवं जनसहयोग से अपने व्यापार को सफल बनाने का भरसक प्रयास करता है। छोटे पैमाने पर जो व्यवसाय किये जाते हैं, वे प्रायः एकल व्यवसाय के रूप में ही किये जाते हैं, जैसे—फेरी वाले, ठेल वाले, छोटे दुकानदार, ढाबे, हलवाई आदि एकल व्यवसाय के प्रमुख उदाहरण हैं।
एकाकी व्यवसाय की विशेषताएँ या लक्षण (Characteristics of Sole Trade)
एकाकी व्यवसाय की प्रमुख विशेषताएँ या लक्षण निम्नलिखित हैं -
(1) एकाकी स्वामित्व - एकाकी व्यापारी अपने व्यवसाय का स्वयं ही स्वामी होता है। व्यापार के समस्त कार्यों के लिए वह स्वयं उत्तरदायी होता है। इस प्रकार के व्यापार में स्वामित्व एवं जोखिम सहगामी होते हैं। जो व्यक्ति व्यापार का स्वामी होता है उस पर ही व्यापार का समस्त भार होता है।
(2) वैधानिक शिष्टाचार - एकल व्यापारी किसी विशिष्ट विधान के अन्तर्गत नहीं आता। अतः इस प्रकार के व्यापारियों के लिए कोई वैधानिक प्रतिबन्ध नहीं है और न ही इस प्रकार के व्यापारियों को किन्हीं वैधानिक नियमों की पूर्ति करनी होती है। वह अपने व्यापार को कभी भी आरम्भ कर सकता है, परन्तु इतना अवश्य है कि उस व्यक्ति में अनुबन्ध करने की क्षमता होनी चाहिए। एक दिवालिया, पागल अथवा अवयस्क व्यक्ति में अनुबन्ध करने की क्षमता नहीं होती है, साथ ही वह व्यवसाय भी अवैधानिक न हो।
(3) व्यापारिक जोखिम - व्यापार के समस्त जोखिम का उत्तरदायित्व व्यापार के स्वामी पर होता है। यहाँ यह आवश्यक नहीं है कि व्यापार की पूँजी, श्रम, भूमि तथा संगठन सब एक ही व्यक्ति के हों। उत्पादन के इन समस्त साधनों का प्रबन्ध व्यवसाय का स्वामी कहीं से भी कर सकता है। इनके प्रबन्ध का उत्तरदायित्व व्यवसाय के स्वामी पर ही निर्भर करता है।
(4) असीमित उत्तरदायित्व — एकाकी व्यवसाय में एकल व्यापारी का दायित्व सदैव असीमित होता है। अपने व्यापार में दायित्वों के भुगतान के लिए व्यापार में लगी उसकी पूँजी के अतिरिक्त उसकी निजी सम्पत्ति भी उत्तरदायी होती है।
(5) स्वतन्त्रता - एकल व्यापारी अपनी इच्छानुसार किसी भी प्रकार के व्यापार को प्रारम्भ कर सकता है। उसके ऊपर किसी भी प्रकार का कोई राजकीय नियन्त्रण नहीं होता।
(6) पूँजी पर एकाधिकार - एकाकी व्यापार में लगाई जाने वाली समस्त पूँजी का प्रबन्ध व्यापार के स्वामी को स्वयं ही करना होता है। वह इस पूँजी को स्वयं अपने पास से लगाता है। यदि अपनी पूँजी के अतिरिक्त और अधिक पूँजी की आवश्यकता होती है तो वह अपने मित्रों या सम्बन्धियों से ऋण के रूप में पूँजी प्राप्त कर सकता है।
(7) कार्य-क्षेत्र - एक अकेला व्यक्ति एक ही स्थान पर कार्य कर सकता है। अधिक स्थानों पर कार्य करना उसके लिए सम्भव नहीं है। अतः एकाकी व्यापारी का कार्य क्षेत्र प्रायः एक स्थान विशेष तक ही सीमित रहता है। व्यापारी की कार्यक्षमता और उसकी सीमित पूँजी भी उसके व्यवसाय के विस्तार में बाधक होती है। आज के युग में कुछ व्यापारी ऐसे भी हैं जिनका व्यापार देश के विभिन्न भागों में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी फैला हुआ है, लेकिन ऐसे व्यापारी बहुत कम हैं।
(8) प्रबन्ध - एकाकी व्यापार के प्रबन्ध एवं नियन्त्रण का समस्त उत्तरदायित्व व्यापार के स्वामी का होता है। समयानुसार अपने व्यापारिक नियमों में परिवर्तन करने तथा किसी भी प्रकार के निर्णय लेने के लिए वह पूर्णरूप से स्वतन्त्र होता है। व्यवसाय का स्वामी ही व्यवसाय का संगठनकर्त्ता और व्यवस्थापक भी होता है अपनी सहायता के लिए वह अन्य व्यक्तियों को नियुक्त कर सकता है। इन नियुक्त किये गये व्यक्तियों के समस्त कार्यों के लिए वह स्वयं उत्तरदायी भी होता है 1
(9) व्यापार का सूत्रधार - एकल व्यापारी अपने व्यापार का सूत्रधार भी होता है। उसकी अनुपस्थिति में व्यापार के कार्य-संचालन में अनेक बाधाएँ उपस्थित हो जाती हैं और व्यापार कार्य छिन्न-भिन्न हो जाता है। कोई अन्य व्यक्ति व्यक्तिगत सम्पर्क के अभाव में उस व्यापार के कार्य को सम्भालने में असमर्थ रहता है।
(10) व्यवसाय तथा उसके स्वामी में कोई अन्तर नहीं - एकाकी व्यवसाय तथा उसके स्वामी में कोई अन्तर नहीं होता वरन् वे दोनों एक ही होते हैं। वास्तव में यदि देखा जाय तो व्यवसाय का अस्तित्व उसके स्वामी के अस्तित्व से जुड़ा रहता है।
क्या एकाकी व्यवसाय का आकार सदैव छोटा होता है ? (Is the size of Sole Trade always Small ? )
कुछ व्यक्ति यह मानते हैं कि एकाकी व्यवसाय केवल छोटे पैमाने पर ही किया जा सकता है। यह तथ्य काफी सीमा तक सही प्रतीत होता है क्योंकि एकाकी व्यवसायी के पूंजी के साधन तथा संचालन क्षम बहुत सीमित होती है, किन्तु कुछ स्थितियों में एकाकी व्यवसायी अपने रिश्तेदारों अथवा बैंक आदि से घर प्राप्त करके पर्याप्त साधन एकत्रित कर सकता है। इसी प्रकार विभिन्न योग्यताओं से पूर्ण कर्मचारियों की नियुक्ति करके व्यवसाय के संचालन में बहुत उन्नति कर सकता है।
भारत में एकाकी व्यवसाय
(Sole Trade in India)
भारत एक कृषि प्रधान देश है। यहाँ की अधिकांश जनसंख्या प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है। हमारे देश की जनसंख्या पाश्चात्य देशों की अपेक्षा अत्यन्त तीव्र गति से बढ़ रही है। देश में बेरोजगारी, अशिक्षा तथा ऋणग्रस्तता जैसी अनेक महत्त्वपूर्ण समस्याएँ हैं। कम पूँजी होने के कारण बड़े-बड़े उद्योगों की स्थापना एवं संचालन में अनेक कठिनाइयाँ हैं। देश में छोटे-छोटे उद्योग-धन्धे स्थापित करना आवश्यक है। यहाँ का व्यापारी अधिक जोखिम लेने में असमर्थ है। इन परिस्थितियों में व्यावसायिक संगठन का एकाकी स्वरूप ही सर्वश्रेष्ठ है। अतः एकाकी व्यवसाय का भविष्य भारतवर्ष में निश्चित रूप से उज्ज्वल है।
क्या एकाकी व्यवसाय 'असभ्य युग का अवशेष' है ?
(Is Sole Trade a Relic of Barbaric Age?)
एकाकी व्यवसाय आधुनिक सभ्यता का परिचायक है। आज जो देश औद्योगिक सफलता के उच्चतम शिखर पर पहुँच चुके हैं एवं आधुनिक सभ्यता के प्रतीक हैं वहाँ एकाकी व्यवसाय का आज भी महत्त्वपूर्ण स्थान है। वास्तविकता तो यह है कि प्राचीन समय से अब तक इतने संघर्ष और कठिन प्रतियोगिता के मध्य भी एकाकी व्यापार अडिग है। उसको कोई भी हिला नहीं सका है। यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि एकाकी व्यवसाय मानव सभ्यता एवं संस्कृति का तथा उसके आर्थिक ढाँचे का एक महत्त्वपूर्ण स्तम्भ है। अतः कुछ लोगों का यह कहना कि एकाकी व्यवसाय “असभ्य युग का अवशेष” अथवा “जंगली युग का प्रतीक है”, पूर्णतः अनुचित है। वास्तव में एकाकी व्यवसाय सभ्यता के किसी विशेष युग का प्रतीक न होकर आधुनिक कलात्मक प्रवृत्तियों का पोषक, सीमित बाजारों का प्राण एवं विशाल संगठनों की त्रुटियों का पूरक है।
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Thank you for reading this article ☺️☺️
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