व्यावसायिक संगठन के स्वरूप ( Form of Business Organisation )

व्यावसायिक संगठन क्या है ?
आज हम व्यावसायिक संगठन के बारे में जानेगे आख़िरकार व्यावसायिक संगठन होता क्या है ? व्यावसायिक संगठन के स्वरूप का क्या अर्थ होता है ? व्यावसायिक संगठन के स्वरूप कौन कौन से हैं ? तो चालिए हम इस ब्लॉग के माध्यम से समझते हैं… व्यावसायिक संगठन दो शब्दों से मिलकर बना है व्यवसाय + संगठनव्यवसाय शब्द से आशय उन समस्त मानवीय आर्थिक क्रियाओं से है जो धन अर्जित करने के लिए की जाती है; उदाहरण के लिए - किसान द्वारा अनाज उत्पन्न करना, जुलाहे द्वारा कपड़ा बुनना, चिकित्सक द्वारा रोगी का इलाज करना, हलवाई द्वारा मिठाई बनाना इत्यादि। संगठन शब्द से आशय उन व्यक्तियों के एक समूह से हैं जो सामान्य उद्देश्य की पूर्ति के लिए साथ मिलकर कार्य करते हैं।  संक्षेप में कहा जा सकता हैं, व्यावसायिक संगठन से आशय किसी व्यापार को निश्चित योजना के अनुसार संचालित करना और उसमें न्यूनतम व्यय पर अधिकतम उत्पादन शक्ति प्राप्त करना हैं।

व्यावसायिक संगठन के स्वरूप का अर्थ ( Meaning of Form of Business Organisation ) :- साधारण शब्दों में व्यावसायिक उपक्रम से आशय ' व्यावसायिक संस्था ' से होता है। इस व्यावसायिक संस्था को चलाने के लिए इसे स्वतंत्र रूप से स्थापित किया जाता है। व्यवसायी को योग्यता एवं क्षमता के आधार पर व्यवसाय के अनेक रूप हैं। व्यावसायिक संगठन के स्वरूप से आशय इस बात पर आधारित होता है कि व्यवसाय का स्वामी एक व्यक्ति है, कुछ व्यक्तियों का समूह है, सरकार है अथवा कोई अन्य। इसी प्रकार व्यवसायियों का दायित्व कैसा है - सीमित अथवा असीमित।

एल. एच. हैने के अनुसार," वास्तव में समूह के दृष्टिकोण से व्यावसायिक संगठन के विभिन्न प्रारूप उन बच्चों के समान हैं, जिनका पिता आर्थिक उपयुक्तता है तथा उनकी माता विधान (नियम) है। " 

व्यावसायिक संगठन के स्वरूप कौन कौन से हैं ?

वर्तमान में प्रचलित कुछ प्रमुख व्यावसायिक संगठन के स्वरूप निम्नलिखित हैं

(1) एकाकी या एकल स्वामित्व वाले व्यवसाय ( Sole Traders ) 
(2) संयुक्त हिंदू परिवार वाले व्यवसाय ( Joint Hindu Family Businesses ) 
(3) साझेदारी संस्थाएं ( Partnerships ) 
(4) संयुक्त पूंजी वाली कंपनी ( Joint Stock Companies ) 
(5) सहकारी संस्थाएं ( Co-operative Institutions ) 
(6) सरकारी स्वामित्व वाली संस्थाएं ( Public Enterprise ) 
(7) विशिष्ट संघ ( Combinations )

(1) एकाकी (एकल) स्वामित्व वाले व्यवसाय - एकाकी व्यापार व्यवसाय का सबसे प्राचीन एवं सरल रूप है। व्यावसायिक संस्थाओं के वर्तमान विभिन्न स्वरूप इसी के विकास मात्र हैं। एकल व्यापारी वह है जो व्यापार को स्वयं अपनी जोखिम पर चलाता है, स्वयं ही उसका कर्त्ता, स्वामी एवं समस्त लाभ का पूर्ण अधिकारी होता है। हम इसको इस प्रकार भी कह सकते हैं कि व्यापार का समस्त उत्तरदायित्व इस अकेले स्वामी के कन्धों पर होता है। एकल व्यापारी व्यापार का संचालन अपने निजी अनुभव से करता है। संचालन में कार्यक्षमता, कुशलता एवं निपुणता उसको स्वयं की होती है।

(2) संयुक्त हिन्दू परिवार वाले व्यवसाय - परिवार के कर्त्ता (Head) द्वारा स्थापित किये गये व्यवसाय में उसके बच्चों को जन्म से ही व्यवसाय में अधिकार प्राप्त हो जाता है। उन्हें किसी भी अनुबन्ध की आवश्यकता नहीं होती है। ऐसे व्यवसाय पर 'हिन्दू अधिनियम' (Hindu Law) लागू होता है।

(3) साझेदारी संस्थाएँ - जब दो या दो से अधिक व्यक्ति पारस्परिक लाभ के लिए मिलकर व्यवसाय करने के लिए सहमत हो जाते हैं तो वह स्वरूप साझेदारी संस्था कहलाती है।

(4) संयुक्त पूँजी वाली कम्पनी - जब बड़ी मात्रा में पूँजी की आवश्यकता होती है तो संयुक्त पूँजी वाली कम्पनी का निर्माण किया जाता है। इसके सदस्यों (अंशधारियों) का दायित्व अंशों के रूप में दिये गये धन तक ही सीमित रहता है। कम्पनी के प्रबन्ध के लिए अंशधारी अपने प्रबन्ध संचालक/संचालकों का चुनाव करते हैं।

(5) सहकारी संस्थाएँ – सहकारिता के सिद्धान्त पर स्थापित की जाने वाली संस्थाएँ 'सहकारी भण्डार अथवा ‘सहकारी संस्थाएँ' कहलाती हैं। इनका उद्देश्य लाभ कमाना नहीं होता अपितु थोक विक्रेताओं से बड़ी मात्रा में वस्तुएँ खरीदकर उन्हें अपने सदस्यों को देना होता है। इन संस्थाओं का सिद्धान्त होता है—“एक सबके लिए और सब एक के लिए" ।

(6) सरकारी स्वामित्व वाली संस्थाएँ – सार्वजनिक उपक्रम व्यवसाय का एक ऐसा स्वरूप है जो सरकार द्वारा निर्गमित, प्रबन्धित, संचालित तथा नियन्त्रित किया जाता है।

(7) विशिष्ट संघ - पारस्परिक प्रतिस्पर्द्धा के कारण जब मिश्रित पूँजी कम्पनियों को हानि हुई तो कम्पनियों को मिलाकर विशिष्ट संघों की स्थापना की गई।

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